उदित नारायण : सुर ही नहीं, ये शख्स भी विनम्र है
मनु पंवार
(डिस्क्लेमर : पहले ही बता दे रहा हूं। यह कोई व्यंग्य नहीं है। यादों के ख़ज़ाने में कई ऐसी
चीजें हैं जिन्हें साझा करने का मन है। वो चीजें हैं मेरी कुछ हस्तियों से
अच्छी मुलाकातें। अलग-अलग कालखण्डों में हुई इन मुलाक़ातों में कई दिलचस्प
किस्से, कुछ मज़ेदार बातें भी हैं। उन यादों के गलियारे में इस बार उदित नारायण से हुई मुलाक़ात को साझा कर रहा हूं। )
यह साल 2002 की बात है। उन दिनों उदित नारायण का सितारा बुलंदी पर था। 'लगान', 'गदर' फ़िल्म सुपर-डुपर हिट हो चुकी थी। उदित नारायण के गाए गानों की धूम मची हुई थी। उन्हें 2001 में 'लगान' और 'दिल चाहता है' फ़िल्म के लिए नेशनल अवॉर्ड भी मिला। फ़िल्म 'गदर', 'कहो न प्यार है', 'धड़कन', 'फ़िज़ा' में गाए गानों के लिए स्क्रीन, फिल्मफेयर जैसे अवॉर्ड भी मिल चुके थे।
इसलिए जब शिमला के ओबरॉय सेसिल होटल में उनसे मिलना तय हुआ तो मैं मुलाकात से पहले मन ही मन ये सोच रहा था कि उदित में भी स्टारों वाली हनक होगी। क्योंकि उन दिनों बॉलीवुड में वो सबसे बड़े, सबसे हिट प्लेबैक सिंगर थे। लेकिन जब उनसे मिला तो मन में बनी पूरी तस्वीर धुल गई।
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| उदित नारायण और उनकी पत्नी के साथ |
उनकी विनम्रता ने मुझे हैरान कर दिया। किसी बड़े विचारक ने कहा है, अति विनम्र आदमी से हमेशा सावधान रहो। उस वक़्त मेरे कानों में यही उक्ति गूंजती रही। लेकिन उदित से मुलाकात और फ़िर लंबी बातचीत में मुझे ये अहसास हो गया कि वो वाक़ई विनम्र हैं। इस विनम्रता में छल नहीं है। कुटिलता नहीं है। वह बहुत सरल, बहुत नेकदिल इंसान हैं। शायद लंबे संघर्षों के बाद मिली कामयाबी ने उदित नारायण को इतना विनम्र बना दिया हो।
मैंने पूछा, ‘‘आप सन् 78 में मुंबई आ गए थे और पहचान मिली सन् 1988 में ‘कयामत से कयामत’ फ़िल्म से। कभी लगा नहीं कि छोड़ो यार वापस लौटते हैं, यहां दाल नहीं गलने वाली? उदित बोले, ‘‘हां, ऐसा मुझे कई बार लगा कि कहां फंस गए। लेकिन फिर सोचा कि हार नहीं मानूंगा। मेरे पास आवाज़ है। कभी तो...कहीं तो...किसी को तो सुनाई देगी।’’ यह एक बड़ा सबक था। तमाम विषम हालातों के बावजूद टिके रहने का जज़्बा कितना ज़रूरी है।
उदित नारायण : सुर ही नहीं, ये शख्स भी विनम्र है
Reviewed by Manu Panwar
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December 29, 2018
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