गांव डायरी- 2 : तुम्हारी खातिर मंदरे सा बिछ गया

मनु पंवार

((अगर आप ये जानते हैं कि गेंहू से हमें सिर्फ रोटी मिलती है तो जरा रुकिए. गेंहू के तने से बिछौना भी बनता है. उसे बनाते हैं कुछ मेहनतकश पहाड़ी हाथ. यह खास कारीगरी है उत्तराखण्ड में गढ़वाल इलाके के गांवों में. आखिर क्या है वो बिछौना? वो कहां-कहां और कैसे काम आता है? इस लेख में पढ़िएगा.)

मंदरा बनाने में गेहूं के तने का इस्तेमाल होता है
गांव के बुजुर्ग गुजर गए तो उनके साथ-साथ अनूठा हुनर भी जाता रहा। जैसे, हमारे गांव में कभी 'मंदरा' बुनने वाले लोग थे। मंदरा एक तरह की चटाई है, लेकिन चटाई से काफी अलग है। चटाई काफी पतली व हल्की हाेती है लेकिन मंदरा इसकी तुलना में काफी माेटा और वज़नी हाेता है। उसे आसानी से उठाया नहीं जा सकता। यह उत्तराखण्ड के गढ़वाल इलाके का पारंपरिक बिछौना है।
मंदरा हमारे पहाड़ में ग्रामीण हस्तशिल्प का बेजोड़ उदाहरण रहा है। यह नायाब कारीगरी अब इतिहास हो गई है। बाज़ार ने बड़ी निर्ममता के साथ इन्हें चलन से बाहर कर दिया। इसकी एक वजह यह भी है कि अगली पीढ़ी ने भी हाथ की कारीगरी वाली इस कला को अपनाने में कोई दिलचस्पी नहीँ दिखाई। लिहाज़ा इस कला का हस्तांतरण नहीं हो पाया।

मंदरा बनाने में गेंहू के तने का इस्तेमाल होता है। तने की छाल (बाहरी त्वचा) को अलग करके उसके अंदर के हिस्से को भीमल की रस्सी से बुना जाता था। भीमल एक पेड़ है जोकि हिमालयी इलाके में 2000 मीटर की ऊंचाई तक पाया जाता है। जानकारों से पता चला कि इसका बॉटनिकल नाम 'ग्रेवीया अपोजीटीफोलिया' है। भीमल की पतली टहनियों से मजबूत रेशा निकलता है। उसी से रस्सी बनती है। यूं भीमल के पेड़ों की सदाबहार पत्तियों से हर सीजन में जानवरों का चारा मिलता है।
हमारे दिवंगत नानाजी का बनाया मंदरा
बचपन की याद है। हमारे गांव में 4-5 परिवार मंदरे बुना करते थे। मंदरा कई काम आता था। शादी-ब्याह में, मेहमाननवाज़ी में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होता। इस पर किसी मौसम का असर नही पड़ता। कभी जब गांव में लड़की की बारत आती थी तो पूरी बारात के लिए सबसे सुंदर आसन मंदरा ही होता था। अगर किसी गांव में पर्याप्त मंदरे नहीं होते थे तो आस-पड़ोस के गांवों से भी लोग अपने-आप भेज देते थे। ऊपर वाली तस्वीर में आप जो बड़ा वाला मंदरा देख रहे हैं, वो कई बरस पहले हमारे नानाजी दिवंगत पद्म सिंह रावत जी ने बनाया था जोकि जन्मांध थे।
मंदरे की बुनावट करीब से
गढ़वाल के लोकजीवन में मंदरा बहु-उपयाेगी रहा है। गांव में पंचायत बैठने, शादी-ब्याह, सुख-दुख, सांस्कृतिक आयोजन जैसे तमाम जगह इसका उपयाेग हाेता रहा है। यही नहीं, खेताें में धान आदि की मंडाई करने तथा घर में उपज काे सुखाने के लिए भी अक्सर मंदरे का ही उपयाेग किया जाता रहा है।

'मंदरा' हिमालय के गढ़वाल वाले अंचल के लोकजीवन का किस कदर हिस्सा है, इसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि मंदरे को गीतों में भी जगह मिली है। उत्तराखण्ड के चर्चित गीतकार/गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने अपने एक गढ़वाली गीत में 'मंदरा' को एक बिंब की तरह इस्तेमाल किया है-

'देब्तौं मा कभि घुण्डा नई टेक्या 
तुम खुणि मदरू सि पसिरि गयूं।'

इसका हिंदी भावानुवाद कुछ यूं है- 

'मैंने देवताओं के आगे कभी घुटने नहीं टेके
लेकिन तुम्हारे लिए मंदरे सा पसर गया।'

हमारे गांव में अब न मंदरा रहा, न मंदरा बुनने वाले। पूरे गांव की खाक छानने के बाद मुझे एक जगह ये सौगात मिली। मंदरा के हुनरमंद दिवंगत कृपाल सिंह रावत के बेटे गंभीर सिंह रावत ने ये छोटा मंदरा अपने पिता की आखिरी निशानी के तौर पर मुझे भेंट किया। 
गांव डायरी- 2 : तुम्हारी खातिर मंदरे सा बिछ गया गांव डायरी- 2 : तुम्हारी खातिर मंदरे सा बिछ गया Reviewed by Manu Panwar on January 12, 2019 Rating: 5

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