शाही पनीर जैसे तो नहीं हो गए शाही इमाम?
मनु पंवार
देश में कोई भी बड़ा और प्रतिष्ठा वाला चुनाव दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी के बयान के बग़ैर गुज़र जाए, ऐसा हालिया वर्षों में हुआ तो नहीं है. इस बार तो बुखारी साहब ने कह दिया कि वो किसी भी पार्टी को सपोर्ट नहीं करेंगे. मानो उनके सपोर्ट के बगैर किसी का काम नहीं चल सकता.
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| साभार: विक्रम नंदवानी का कार्टून |
'शाही' की बात ही अलग है. जिन चीजों या नामों के साथ 'शाही' जुड़ा हो, वो हम भारतीय मानस को लुभाता भी बहुत है. कोई माने या न माने, 'शाही' में गज़ब का आकर्षण है. एक अलग ही जलवा है. एक अलग ही रोमांटिसिज्म है उसमें. आज से नहीं, सदियों से. शाही महल, शाही घराना, शाही अंदाज़, शाही शादी, शाही पहनावा, शाही अदालत...और भी न जाने क्या-क्या. हालांकि 'शाही' शब्द में ही सामंती साउंड है, फिर भी भारतीय मानस में इसका बहुत गहरा असर है.
'शाही' का जलवा ही ऐसा है साहब कि कई लोगों ने इसे अपना धंधा चमकाने का ज़रिया बना लिया. यहां तक कि नीम-हकीमों ने भी. सड़क किनारे आपने नीम-हकीमों के तंबू लगे तो देखे ही होंगे? शर्तिया इलाज़ का दावा करते हैं. उनके तंबुओं में लगा बैनर दूर से ही चमकता है..जिसमें लिखा होता है 'शाही दवाखाना'. बताइए... रोड पर बैठा वो नीम-हकीम जड़ी-बूटियों और कई दवाओं के मिश्रण को चूरण बनाकर बेच रहा है और नाम रक्खा है 'शाही दवाखाना'. ये सब उस शाही का ही कमाल है. अब दवाखाने में 'शाही' क्या है, ये भला कौन पूछने वाला है?
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| कुरील का कार्टून |
कभी-कभी तो लगता है कि 'शाही' वो फंडा है जो आप माल बेचने में अच्छा इस्तेमाल कर सकते हैं. लेकिन कुछ लोगों, कुछ चीज़ों या कुछ पदों के साथ 'शाही' लगाया जाना समझ नहीं आया. मसलन, बालूशाही नाम की मिठाई और शाही पनीर. पनीर और बालूशाही तो गली-गली, नुक्कड़-नुक्कड़ मिल जा रही है, उसमें शाही जोड़ने से क्या फर्क पड़ गया? शाही जूतियां भी मार्केट में आई हैं. अब कोई भलामानुष ये समझाए कि भई जूतियां तो जूतियां हैं. ज़मीन पर चलने के ही काम आएंगी. जूतियों के साथ 'शाही' लगाकर बंदा उड़ने तो नहीं लगेगा.
शाही का मोह और शाही का जलवा ही ऐसा है कि बंदे की हैसियत बढ़ा देता है. लेकिन इन शाही इमाम का क्या करें...जोकि चुनाव आते ही वोटों के थोक विक्रेता की तरह प्रकट हो जाते हैं. अरे भई, इमाम तो ठीक हैं मगर ये शाही इमाम क्या चीज़ हैं? अब तो मुल्क में राजघरानों और बादशाहों का दौर भी नहीं रहा. लेकिन साहब 'शाही' में एक अलग ही हनक है. एक अलग ही सामंती ठसक है.
'शाही' निकाल दें तो पनीर की हैसियत क्या रह जाएगी? 'शाही' को अलग कर दें तो बुखारी साहब देश की आम मस्जिदों की ही तरह एक सामान्य से इमाम रह जाएंगे. वैसे बुखारी साहब को पता नहीं ये अहसास कब होगा कि शाही पनीर की तरह शाही इमाम की भी अब पूछ नहीं रही.
शाही पनीर जैसे तो नहीं हो गए शाही इमाम?
Reviewed by Manu Panwar
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April 09, 2019
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